श्लोक- सुभाषित
श्रीमद् भगवद्गीता (कर्मयोग) ।।श्लोक।। श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात। स्वधर्मेनिधनं श्रेय:परधर्मो भयावह:।। अध्याय तिसरा, श्लोक क्रमांक 35 ।।भावार्थ।। मनुष्य ‘कर्म-विना’ एकक्षणही राहू …
श्रीमद् भगवद्गीता (कर्मयोग) ।।श्लोक।। श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात। स्वधर्मेनिधनं श्रेय:परधर्मो भयावह:।। अध्याय तिसरा, श्लोक क्रमांक 35 ।।भावार्थ।। मनुष्य ‘कर्म-विना’ एकक्षणही राहू …
।।श्लोक।। ।। साहित्यसंगित् कला विहीन:l साक्षात्पशु: पुच्छविषाणहीन:।। तृणं न खाद्न्नपि जीवमान:। तद् भागें परंम पशूनाम्।। भावार्थ: ज्या व्यक्तीला साहित्यात, संगीतात …